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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 48
स्रग्धराचुम्बन्तो गण्डभित्तीरलकवति मुखे सीत्कृतान्यादधानावक्षःसूत्कञ्चुकेषु स्तनभरपुलकोद्भेदमापादयन्तः ॥ ऊरूनाकम्पयन्तः पृथुजघनतटात्स्रंसयन्तोंऽशुकानिव्यक्तं कान्ताजनानां विटचरितकृतः शैशिरा वान्ति वाताः ॥
स्त्रियों के केशयुक्त बालों को चूमता हुआ, जोर के जाड़े के मारे उनके मुँह से “सी-सी” करता हुआ, आंगी रहित खुले हुए कुचों को रोमांचित करता हुआ, पेडुओं को कम्पाता हुआ और पुष्ट जांघो से कपडा हटाता हुआ, शिशिर का जार पुरुषों का सा आचरण करता हुआ बह रहा है।
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