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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 72
शार्दूलविक्रीडितनो सत्येन मृगाङ्क एष वदनीभूतो न चेन्दीवर-द्वन्द्वं लोचनतां गतं न कनकैरप्यङ्गयष्टिः कृता ॥ किं त्वेवं कविभिः प्रतारितमनास्तत्त्वं विजानन्नपित्वङ्मांसास्थिमयं वपुर्मृगदृशां मन्दो जनः सेवते ॥
अगर हमसे पक्षपात रहित सच्ची बात पूछी जाय, तो हमको कहना होगा कि चन्द्रमा स्त्री का मुख नहीं, कमल उसके नेत्र नहीं; उसका भी शरीर और सब प्राणियों की तरह हाड़, काम और मांस का है। इस बात को जानकर भी, कवियों की मिथ्या उक्तियों के भुलावे में पड़कर, हमलोग स्त्रियों पर आसक्त रहते हैं और उन्हें सेवन करते हैं।
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