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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 18
उपजातिमात्सर्यमुत्सार्य विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमिदं वदन्तु ॥ सेव्या नितम्बाः किमु भूधरणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ॥
हे योग्य अयोग्य के विचार में निपुण पुरुषों! आप पक्षपात को छोड़, कर्तव्य-कर्म को विचार और शास्त्रों को देखकर यह बात कहिये कि, इस लोक में जन्म लेकर मनुष्य को पर्वतो के नितम्ब सेवन करने चाहिए अथवा कामदेव कि उमन्ग से मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई विलासवती तरुणी स्त्रिओं के नितम्ब।
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