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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 88
मंदाक्रान्ताबाले लीलामुकुलितममी सुंदरा दृष्टिपाताःकिं क्षिप्यन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥ सम्प्रत्यन्त्ये वयसि विरतं बाल्यमास्था वनान्ते क्षीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥
हे बाले! लीला से जरा जरा खुले हुए नेत्रों से सुन्दर कटाक्ष हम पर क्यों फेंकती है? विश्राम ले! विश्राम ले! हमारे लिए तेरा यह श्रम व्यर्थ है। क्योंकि अब हम पहले जैसे नहीं रहे; अब हमारा छछोरपन चला गया, अज्ञान दूर हो गया। हम बन में रहते हैं और जगज्जाल को तिनके के सामान समझते हैं।
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