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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 3
छन्द – शालिनी भ्रूचातुर्याकुञ्चिताक्षाः कटाक्षाः स्निग्धा वाचो लज्जिताश्चैव हासाः ॥ लीलामन्दं प्रस्थितं च स्थितं च स्त्रीणामेतद् भूषणं चायुधं च ॥
चतुराई से भौंहे फेरना, आधी आँख से कटाक्ष करना, मीठी मीठी बातें करना, लज्जा के साथ मुस्कुराना, लीला से मन्द-मन्द चलना और फिर ठहर जाना । ये भाव स्त्रियों के आभूषण और शस्त्र हैं।
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