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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 49
शार्दूलविक्रीडितकेशानाकुलयन् दृशो मुकुलयन् वासो बलादाक्षिपन्आतन्वन् पुलकोद्गमं प्रकटयन्नावेगकम्पं गतैः ॥ वारंवारमुदारसीत्कृतकृतो दन्तच्छदान्पीडयन्प्रायः शैशिर एष सम्प्रति मरुत्कान्तासु कान्तायते ॥
बालों को बिखेरता, आँखों को कुछ कुछ मूँदता, साड़ी को जोर से उडाता, देह को रोमांचित करता, शरीर में सनसनी पैदा करता, कांपते हुए शरीर को आलिंगन करता, बारंबार सी सी कराकर होठों को चूमता हुआ, शिशिर का वायु, पतियों का सा आचरण करता है।
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