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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 6
छन्द – शिखरिणी स्मितं किञ्चिद् वक्त्रे सरलतरलो दृष्टिविभवः परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोक्तिसरसः ॥ गतानामारम्भः किसलयितलीलापरिकरः स्पृशन्त्यास्तारुण्यं किमिह न हि रम्यं मृगदृशः? ॥
उठती जवानी की मृगनयनी सुंदरियों के कौन से काम मनोमुग्धकर नहीं होते? उनका मन्द-मन्द मुस्काना, स्वाभाविक चञ्चल कटाक्ष, नवीन भोग-विलास की उक्ति से रसीली बातें करना और नखरे के साथ मन्द-मन्द चलना – ये सभी हाव-भाव कामियों के मन को शीघ्र वश में कर लेते हैं।
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