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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 7
छन्द – शार्दूलविक्रीडित द्रष्टव्येषु किमुत्तमं मृगदृशः प्रेमप्रसन्नं मुखं घ्रातव्येष्वपि किं? तदास्यपवनः, श्रव्येषु किं? तद्वचः ॥ किं स्वाद्येषु? तदोष्ठपल्लवरसः; स्पृश्येषु किं ? तद्वपुः ध्येयं किं? नवयौवनं सहृदयैः सर्वत्र तद्विभ्रम: ॥
रसियों के देखने योग्य क्या है? मृगनयनी कामिनियों का प्रेमपूर्ण प्रसन्न मुख । सूंघने योग्य क्या है? उनके मुंह की श्वास वायु । सुनने योग्य क्या है? उनकी बातें । सवादिष्ट पदार्थ क्या है? उनके होठों की कलियों का रस । छूने योग्य क्या है? उनका कोमल शरीर । ध्यान करने योग्य क्या है? उनका नवयौवन और विलास। इनकी भ्रमपूर्ण उपस्थिति सर्वत्र है।
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