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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 39
शिखरिणीसुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरःप्रियावक्त्राम्भोजं मलयजरसश्चातिसुरभिः ॥ स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणि जनेकरोत्यन्तःक्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे ॥
लिपा पुता साफ़ महल, किरणों वाला चन्द्रमा, प्यारी का मुखकमल, चन्दन की रज और मनोहारी फूलमाला – ये सब चीजें कामी पुरुषों के मन को अत्यन्त क्षोभित करती हैं, परन्तु विषय वासना से विमुख पुरुषों के हृदयों में किसी प्रकार का क्षोभ नहीं करती।
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