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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 16
अनुष्टुभ्गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता । शनैश्चराभ्यां पादाभ्यां रेजे ग्रहमयीव सा ॥
वह स्त्री गुरु स्तनभार से, भास्कर के सामान प्रकाशमान मुखचन्द्र से और शनैश्वर के सदृश मन्दगामी दोनों चरणों से ग्रहमयी सी मालूम होती है।
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