हरिणीपरिमलभृतो वाताः शाखा नवाङ्कुरकोटयोमधुरविरुतोत्कण्ठा वाचः प्रियाः पिकपक्षिणाम् ॥
विरलसुरतस्वेदोद्गारा वधूवदनेन्दवःप्रसरति मधौ रात्र्यां जातो न कस्य गुणोदयः॥
जब सुगन्धियुक्त पवन चला करती हैं, वृक्षों की शाखाओं में नए नए अङ्कुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियों के मुखचन्द्र पे मैथुन के परिश्रम से निकले हुए पसीनो के हलकी हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसंत की रात में, किसे काम, पीड़ित नहीं करता?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शृंगार शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शृंगार शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।