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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 59
शिखरिणीकृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलोव्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः ॥ क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककपालार्पितगलः शुनीमन्वेति श्वा ! हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥
काना, लंगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीर में अनेक घाव हो रहे हैं, उनसे पीब और राध झरते हैं, दुर्गन्ध का ठिकाना नहीं है, घावों में हजारों कीड़े पड़े हैं, जो भूख से व्याकुल हो रहा है और जिसके गले में हांडी का घेरा पड़ा हुआ है, कामांध होकर कुतिया के पीछे पीछे दौड़ता है। है! कामदेव बड़ा ही निर्दयी है, जो मरे को भी मारता है।
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