मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 8
वसन्ततिलका ऐताः स्खलद्वलयसंहतिमेखलोत्थ- झङ्कारनुपुरपराजितराजहंस्य: ।। कुर्वन्ति कस्य न मनो विवशम् तरुण्यो वित्रस्तमुग्धहरिणीसदृशैः कटाक्षैः ।।
चञ्चल कङ्गन, ढीली कौंधनी और पायजेबों के घुंघरुओं की मधुर झनकार से राजहंसों को शर्मानेवाली नवयुवती सुंदरियाँ, भयभीत हिरणी के समान कटाक्ष करके, किसके मन को विवश नहीं कर देती?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शृंगार शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शृंगार शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें