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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 89
शिखरिणीइयं बाला मां प्रत्यनवरतमिन्दीवरदल-प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥ गतो मोहोऽस्माकं स्मरशबरबाणव्यतिकर-ज्वलज्ज्वालाः शांतास्तदपि न वराकी विरमति ॥
इस बाला का क्या मतलब है, जो यह अपने कमल-दल की शोभा को तिरस्कार करने वाले नेत्रों को मेरी ओर चलाती है? मेरा अज्ञान नाश हो गया और कामदेव रुपी भील के बाणों से उत्पन्न हुई अग्नि भी शान्त हो गई, तथापि यह मूर्ख बाला विश्राम नहीं लेती!
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