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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 53
मालिनीवचसि भवति सङ्गत्यागमुद्दिश्य वार्ताश्रुतिमुखमुखराणां केवलं पण्डितानाम् ॥ जघनमरुणरत्नग्रन्थिकाञ्चीकलापंकुवलयनयनानां को विहातुं समर्थः ? ॥
शास्त्रवक्ता पण्डितों का स्त्री-त्याग का उपदेश केवल कथनमात्र ही है। लाल रत्न-जड़ित करधनीवाली कमलनयनी स्त्रियों की मनोहर जंघाओं को कौन त्याग सकता है।
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