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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 10
वसन्ततिलकानूनं हि ते कविवरा विपरीतबोधाये नित्यमाहुरबला इति कामिनीस्ताः ॥ याभिर्विलोलतरतारकदृष्टिपातैःशक्रादयोऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः॥
स्त्रियों को “अबला” कहनेवाले श्रेष्ठ कवियों की बुद्धि निश्चय ही उलटी है । भला, जो अपने नेत्रों के चञ्चल कटाक्षों से महाबली इन्द्रादि देवताओं को भी मार लेती है, वे “अबला” किस तरह हो सकती है।
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