शिखरिणीभवन्तो वेदान्तप्रणिहितधियामाप्तगुरवोविशित्रालापानां वयमपि कवीनामनुचराः ॥
तथाप्येतद् ब्रूमो न हि परहितात्पुण्यमधिकंन चास्मिन्संसारे कुवलयदृशो रम्यमपरम् ॥
आप वेदान्तवेत्ताओं के माननीय गुरु हो और हम उत्तम काव्य रचयिता कवियों के सेवक हैं; तो भी हमें यह बात कहनी ही पड़ती है कि परोपकार से बढ़कर पुण्य नहीं है और कमलनयनी सुन्दर स्त्रियों से बढ़कर सुन्दर पदार्थ नहीं है।
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