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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 82
मालिनी इह हि मधुरगीतं नृत्यमेतद्रसोऽयं स्फुरति परिमलोऽसौ स्पर्श एष स्तनानाम् । इति हतपरमार्थैरिन्द्रियैर्भाम्यमाणः स्वहितकरणदक्षैः पञ्चभिर्वञ्चितोऽसि ॥
यह कैसा मधुर गाना है, यह कैसा उत्तम नाच है, इस पदार्थ का स्वाद कैसा अच्छा है, यह सुगन्ध कैसी मनोहर है, इन स्तनों को छूने से कैसा मजा आता है! हे मनुष्य! तू इन पांच विषयों में भ्रमता हु – परमार्थ नाशिनी नरकादि की साधनभूत पांचों इन्द्रियों से ठगा गया है।
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