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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 68
अनुष्टुभ्स्मृता भवति तापाय दृष्ट्वा चोन्मादवर्धिनी । स्पृष्टा भवति मोहाय ! सा नाम दयिता कथम् ॥
जो स्त्री स्मरणमात्र करने से सन्ताप कराती है, देखते ही उन्माद बढाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसे न जाने क्यों प्राण-प्यारी कहते हैं?
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