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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 99
यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिंस्तस्य स्पृहा मनोज्ञेऽपि । रमणीयेऽपि सुधांशौ न मनःकामः सरोजिन्याः ।।
जिसकी जिस चीज़ में रूचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, परन्तु कमलिनी उसे नहीं चाहती।
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