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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 75
शार्दूलविक्रीडितउन्मीलत्त्रिवलितरङ्गनिलया प्रोत्तुङ्गपीनस्तन-द्वन्द्वेनोद्यतचक्रवाकमिथुना वक्त्राम्बुजोद्भासिनी ॥ कान्ताकारधरा नदीयमभितः क्रूराशया नेष्यतेसंसारार्णवमज्जनं यदि तदा दूरेण सन्त्यज्यताम् ॥
रूप ही जल है, चञ्चल नयन मछलियां हैं, नाभि भंवर है और सर के बाल सर्प हैं – यह तरुण स्त्री रुपी नदी, दुस्तर नदी है। इस नदी में श्रृंगार-शास्त्र प्रवीण सज्जन स्नान करते हैं।
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