स्रग्धरासन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति च नरस्तावदेवीन्द्रियाणांलज्जां तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्बते तावदेव ॥
भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्माण एतेयावल्लीलावतीनां हृदि न धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ॥
पुरुष सत्मार्ग में तभी तक रह सकता है, इन्द्रियों को तभी तक वश में रख सकता है, लज्जा को उसी समय तक धारण कर सकता है, नम्रता का अवलम्बन तभी तक कर सकता है, जब तक कि लीलावती स्त्रियों के भौंह रुपी धनुष से कानों तक खींचे गए, श्याम वरौनि रुपी पङ्ख धारण किये, धीरज को छुड़ाने वाले नयन रुपी बाण ह्रदय में नहीं लगते।
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