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अध्याय 2 — द्वितीयोल्लासः

कुलार्णव
120 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने पूछा - हे कुलेश! हे सभी जीवों पर दया करने वाले! आपने कुलधर्म के सम्बन्ध में तो बताया, किन्तु उस पर प्रकाश नहीं डाला। उसे मैं सुनना चाहती हूँ।
हे प्रभो! उस सर्वधर्मोत्तम धर्म को और उसके माहात्म्य तथा ऊर्ध्वाम्नाय के माहात्म्य एवं उस सम्प्रदाय को बताने की कृपा करें। हे परमेशान! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो उनके सिद्धान्तों को मुझसे कहिए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आप पूछती हैं, उसे मैं कहूँगा। जिसके श्रवण मात्र से साधक योगिनियों का प्रिय होता है।
पहले हमने ब्रह्मा, विष्णु एवं गुह (कार्तिकेय) को भी इसे नहीं बताया है, किन्तु मैं आपके स्नेहवशात् कहता हूँ। अतः एकाग्र मन होकर सुनिए।
परम्परा के क्रम से आने वाला और मेरे पाँच मुखों में स्थित होने वाला वह 'तत्त्व' यद्यपि अकथनीय है, तथापि परमार्थ की दृष्टि से मैं उसे कहता हूँ।
आपको भी इसका गोपन करना चाहिए। जिस किसी को इसे नहीं बताना चाहिए। मात्र भक्त शिष्य को ही यह ज्ञान प्रदान करना चाहिए अन्यथा उस गुरु का पतन होता है।
सबसे उत्तम वेद हैं, वेदों से उत्तम वैष्णव हैं, वैष्णव से उत्तम शैव, शैव से उत्तम दक्षिण, दक्षिण से उत्तम वाम, वाम से उत्तम सिद्धान्त, सिद्धान्त से उत्तम कौल हैं, किन्तु कौल से उत्तम कोई नहीं है।
हे देवि! कुलाचार समस्त गुह्य में भी अत्यन्त गुह्य आचार है। सभी सारों का भी सार है। उत्तमों में भी उत्तम आचार है। गुरु शिष्य की परम्परा से एक दूसरे से सुनकर गुरुमुख से प्राप्त होता है। हे देवि! यह साक्षात् शिवप्रद (कल्याणकारी) है।
वेद और आगमरूपी महासमुद्र को ज्ञानरूपी मथानी से मथकर हे देवि! मैंने इस कुलधर्म को प्रकट किया है।
हे प्रिये! एक तरफ सभी धर्म, यज्ञ, तीर्थ एवं व्रत आदि पुण्य आचार हों और एक तरफ मात्र कुल धर्म ही हो तो उनमें से कौलिक आचार मुझे अधिक प्रिय है।
टेढ़ी-मेढ़ी, एवं सीधी होकर भी जाने वाली सभी नदियाँ जैसे समुद्र में ही मिल जाती हैं, वैसे ही विविध प्रकार के धर्म भी अन्ततः कुलधर्म में ही विलीन हो जाते हैं।
जैसे सभी प्राणियों के पैर हाथी के पैर में समा जाते हैं वैसे ही, हे प्रिये! सभी दर्शन कुलधर्म में ही समा जाते हैं।
जैसे लोहा कभी भी सोने की बराबरी नहीं कर सकता है वैसे ही अन्य कोई भी मत (सिद्धान्त) इस कुल धर्म की बराबरी नहीं कर सकते हैं।
जैसे अन्य नदियाँ कभी भी गङ्गा नहीं बन सकती है उसी प्रकार अन्य मतवाद भी कभी कुलधर्म के समान नहीं बन सकते।
जैसे मेरु पर्वत और सरसों के दाने में और सूर्य एवं जुगनू के प्रकाश में बराबरी नहीं है उसी प्रकार अन्य मतवादों और कुलधर्म के बीच कोई तुलना नहीं है किन्तु महान् अन्तर है।
आप (देवि) के जैसे कोई नारी हो सकती है और मेरे (शिव) जैसा कोई पुरुष भी हो सकता है किन्तु कुल धर्म के समान कोई धर्म नहीं हो सकता।
यदि कोई मूर्ख अज्ञान में पड़कर अन्य धर्म को कुल धर्म से अधिक मान बैठता है तो वह सांसारिक बन्धनों में बंध जाता है और निम्न जाति के लोगों का प्रिय बन जाता है।
हे प्रिये! जो अज्ञान में पड़कर कुल धर्म से अधिक अन्य धर्मो के विषय में चर्चा करता है तो वह निःसन्देह ब्रह्महत्यादि से भी अधिक पाप को प्राप्त करता है।
हे देवि! कुलधर्म के रथ पर चढ़कर श्रेष्ठ मनुष्य इस लोक को पारकर स्वर्ग को जाता है और मोक्षरूपी रत्न को प्राप्त करता है।
सभी अन्य दर्शनों में दीर्घकालीन प्रयास से ही मनुष्यों को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है किन्तु कौल धर्म में अभ्यस्त साधक शीघ्र ही जीवन्मुक्त हो जाता है इसमें सन्देह नहीं है।
हे मेरी प्राणवल्लभे! हे कुलनायिके! अधिक कहने से क्या लाभ? आप सुन लें कि मैं आपके द्वारा अभिशप्त हूँ कि कुलधर्म से अधिक संसार में कुछ भी नहीं है।
जो योगी होता है, वह भोगी नहीं होता और जो भोगी होता है, वह योग को नहीं जानता। किन्तु 'कौल' भोग और योग दोनों से युक्त है। अतः हे प्रिये! वह सबसे श्रेष्ठ है।
हे कुलेश्वरि! कुलधर्म में भोग ही साक्षात् योग का रूप ले लेता है, पातक सुकृत बन जाता है और संसार मोक्ष का साधन हो जाता है।
हे देवि! ब्रह्मा, इन्द्र, अच्युत, रुद्रादि देवता और श्रेष्ठ मुनि भी कुलधर्म परायण रहे है, अतः मनुष्यों की क्या बात है।
अतः यदि आत्मसिद्धि प्राप्त करने की इच्छा हो, तो सभी धर्मों और नाना मतवादों को छोड़कर कुलधर्म का ही ज्ञान प्राप्त करे।
पूर्वजन्मों मे किये गये अभ्यास के फलस्वरूप जीव को कुलधर्म के ज्ञान का प्रकाश स्वतः प्राप्त होता है। यह ज्ञान उपदेश के बिना ही, जैसे स्वप्न में प्राप्त अनुभूतियों से जागकर ज्ञान मिलता है वैसे ही स्वयं प्रतिभासित हो जाता है।
पिछले सहस्त्रजन्मों में मनुष्य की जो बुद्धि विकसित होती है, मात्र उसी से जीव को ज्ञान मिलता है, उपदेश की आवश्यकता ही नहीं होती।
शैव, वैष्णव, दुर्गा, सूर्य या गणपति, आदि किसी भी सम्प्रदाय के मन्त्रों से जिसका चित्त विशुद्ध हो चुका है, उसे ही कुलधर्म का ज्ञान होता है।
अन्य सभी धर्म तो 'पुनरावर्तक' हैं अर्थात् उनके पालन करने वाले आवागमन के चक्र में पड़े रहते हैं। किन्तु हे देवेशि! सभी कुलधर्मानुयायी 'अनिवर्तक' अर्थात् आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
हे देवि! पूर्व जन्म में किये हुये तप, दान, यज्ञ तीर्थसेवन, जप, व्रत आदि के द्वारा जिन मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं, उन्हें कुलधर्म का ज्ञान प्राप्त होता है।
हे देवि! जिस पर आप (भगवती) और हम (शिव) दोनों प्रसन्न होते हैं और हे सभी का कल्याण करने वाली देवि! जिसे देवता एवं गुरु में भक्ति है, उसे कुलधर्म का ज्ञान होता है।
शुद्धचित्त, शान्त, कर्मशील, गुरु की सेवा में परायण और परम भक्त तथा गुह्य साधक को कुल का ज्ञान होता है।
श्री गुरुदेव में, कुलधर्म के शास्त्रों में, कौलिकों में और कौल-परिवारों में जिसकी दृढ़ भक्ति होती है, उसे कुलधर्म का ज्ञान मिलता है।
श्रद्धा, नम्रता, हर्ष आदि के साथ सदाचार के नियमों का दृढ़ता से पालन करते हुये जो साधक गुरु की आज्ञा एवं धर्म को मानता है, उसे कुलधर्म का ज्ञान होता है।
अनधिकारी व्यक्ति कुलधर्म के विज्ञान को समझ नहीं सकता। अतः परीक्षा लेकर ही अधिकारी व्यक्ति को मेरे बताए गए कुलधर्म का ज्ञान कराना चाहिये।
अयोग्य व्यक्ति को कुलधर्म या कुलशास्त्र नहीं बताना चाहिए। इस आज्ञा को भंग करने पर देवता का शाप मिलता है।
समयाचार का पालन करने वाला यदि कुलधर्म का ज्ञान बताता है, तो वह बताने वाला (गुरु) और उस ज्ञान को प्राप्त करने वाला (शिष्य) दोनों ही योगिनियों के पशु होते हैं अर्थात् उनके द्वारा नाश को प्राप्त होते हैं।
यदि गुरु अधिकारी शिष्य को उद्बोधित कर उसे कुलधर्म का ज्ञान कराये तो इससे दोनों को नित्य योगिनियों और वीरों के साक्षात् सम्मिलन का आनन्द प्राप्त होगा।
जो अनायास ही संसार सागर को पार करना चाहता है, वह इस कुलधर्म को जानकर मुक्ति को प्राप्त करता है इसमें संदेह नहीं।
कुलधर्म के महामार्ग से जाकर अविलम्ब ही मुक्तिपुरी में पहुँचा जाता है, इसमें सन्देह नहीं। अतएव कौल मार्ग का आश्रय ग्रहण करना चाहिये।
हे पार्वति! कुलशास्त्र का अनादर कर जो पशु-शास्त्रों का अभ्यास करता है, वह मानों अपने घर की खीर छोड़कर अन्य लोगों से भीख माँगता फिरता है।
कुल धर्म का परित्याग कर जो अन्य धर्म में परायण हो जाता है वह मानों हाथ में रखे रत्न को छोड़कर दूर स्थित काँच की इच्छा करता है।
कुल मन्त्रों को छोड़कर जो 'अन्य पशु मन्त्रों' का जप करता है, वह मानों अन्न के ढेर को छोड़कर भूसे के ढेर की इच्छा करता है।
कुल परम्परा को छोड़कर, जो दूसरे परम्परा की इच्छा करता है, वह प्यासा मानों तालाब को छोड़कर मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता है।
जिस प्रकार इन्द्रजाल से उत्पन्न माया क्षण भर तक ही सुख देती है, उसी प्रकार हे कुलनायिके! श्री कौल के अतिरिक्त अन्य धर्म (समय) अल्प काल तक ही सुख देते हैं।
कुल (शक्ति देवी) की उपासना से सद्गति - कुलधर्म को बिना जाने हुए जो संसार में मोक्ष पाने की इच्छा करता है, वह मानों अपार सागर को हाथों से तैरकर पार करना चाहता है।
जो दूसरे दर्शनों द्वारा भुक्ति और मुक्ति की कामना करता है, वह मानों स्वप्न में प्राप्त धन से धनी होना चाहता है।
हे पार्वति! जिस प्रकार शुक्ति (सीप) में चाँदी की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार अन्य समयों (धर्मों) में भुक्ति और मुक्ति प्रतिभासित होती हैं।
हे कुलेशानि! सब प्रकार के (नित्य, नैमित्तिक) कर्मों से रहित और वर्ण तथा आश्रम से हीन व्यक्ति भी कुलधर्म में निष्ठा रखकर भुक्ति और मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।
कुल के ज्ञान से रहित व्यक्ति भी यदि कुल की भक्ति का आश्रय लेता है, तो भी वह सद्गति को प्राप्त करता है। फिर कुलधर्म में परायण व्यक्ति का तो क्या कहना।
हे प्रिये! कुलधर्म को नष्ट करने से वह उसका ही नाश करता है और रक्षा करने से वह उसकी रक्षा करता है और पूजा करने से वह शीघ्र ही उसे पूजनीय बनाता है। अतः उस कुलधर्म को नहीं छोड़ना चाहिए।
सभी भाई बन्धु चाहे निन्दा करें, स्त्री पुत्रादि चाहे छोड़ दें, लोग मुझे देखकर चाहे हँसी उड़ाएँ या राजा चाहे दण्ड दें, किन्तु हे परदेवते! मैं आपकी बार-बार सेवा ही करता रहूँगा। मन, वचन, शरीर एवं कर्म से मैं आपके धर्म को नहीं छोडूगाँ इस प्रकार आपत्ति में पड़कर भी जिसकी भक्ति दृढ़ बनी रहती है, वह देवताओं के द्वारा पूजित होकर शिवत्व को प्राप्त करता है।
रोग एवं दरिद्रता के दुःख आदि से सदैव पीड़ित होकर भी, जो साधक भगवती की उपासना भक्तिपूर्वक करता है, हे शिवे! वह सद्‌गति को प्राप्त करता है ।
लोग प्रशंसा करें या निन्दा, लक्ष्मी जाए या रहे, मृत्यु आज हो या युग के अन्त में किन्तु साधक कुलधर्म को कभी भी न छोड़े।
न लोभ से, न क्रोध से, न द्वेष से, न मत्सर (ईर्ष्या) से, न काम से और न भय से किसी भी परिस्थिति में कुलधर्म का त्याग न करे।
जो जीव कुलधर्म का आश्रय लेकर भगवती की पूजा नहीं करता, वह जन्म लेते ही आत्मशत्रु एवं भूतारियों (घातक जीवों) से क्लेश पाता है।
कौलधर्म से जो विमुख हैं, वे जल के बुलबुलों के समान नगण्य है, जैसे अन्न में पुलाक (भूसी) और जीवों में पतङ्ग नगण्य होते हैं।
वृक्षों और मृग-पक्षियों का भी जीवन है किन्तु वास्तविक जीवन उसी का है, जिसका मन कुल धर्म में लगा हुआ है।
कुलधर्म से विहीन जीव के दिन आते हैं और बीत जाते हैं। वह लुहार की धौंकनी के समान श्वास लेता हुआ भी जीवित नहीं है।
हे कुलेश्वरि! कुल धर्म को न जानने वाला मनुष्य चलते-फिरते, बैठते या जागते-सोते पशु के समान ही जीवन व्यतीत करता है।
विद्वान् हो या मूर्ख, धार्मिक हो या अधार्मिक, व्रतधारी हो या व्रत से विमुख हो, जो मनुष्य कौल से विमुख है, वह संसार में जन्म भर लेता है, हे देवि! उसका कोई महत्त्व नहीं होता, जैसे द्वार पर बँधे गधे का कोई महत्त्व नहीं। केवल कुल धर्मपरायण व्यक्ति ही पवित्र जीवन जीते हैं।
कुलधर्म परायण सज्जन ही मनुष्य कहलाने योग्य है। अन्य तो निःसन्देह केवल हड्डियों और खाल के पञ्जर मात्र होते हैं।
हे प्रिये! चारों वेदों का ज्ञाता यदि कुल को नहीं जानता, तो वह चाण्डाल से भी अधम है। और यदि चाण्डाल भी कुल (शक्ति) का ज्ञान रखता है, तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है।
हे देवि! गुरु की कृपा को प्राप्त करने वाला, दीक्षा-संस्कार द्वारा जिसके पाप नष्ट हो गये हैं, कुल (देवी शक्ति) की पूजा में लगा हुआ मनुष्य ही कौल है, अन्य नहीं।
हे देवि! जो कौलिक कुल (शक्ति) को नहीं देखता, नहीं पहचानता अथवा उनकी पूजा नहीं करता, उसे धिक्कार है। उसका जीवन कौए के समान निरर्थक है।
हे देवि! वे पुण्यकर्मी योगी धन्य है, वे सन्त हैं, और वे योगी हैं जिन्हें भाग्यवश कुल का ज्ञान प्राप्त होता है।
वे महात्मा वन्दनीय हैं, वे नर श्रेष्ठ कृतार्थ हैं, जिनके मन में मेरा बताया कुलज्ञान उत्पन्न होता है।
कुलधर्म में प्रवेश करने से सभी प्रकार का प्रकाश (ज्ञान) प्राप्त होता है, सभी तीर्थों के स्नान और सभी यज्ञों के अनुष्ठान का फल मिलता है।
जो सुकृती मनुष्य कुलधर्म में प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी माता के गर्भ में नहीं पड़ते हैं।
प्रसङ्ग से भी जो कोई 'कुल कुल' कहता है, हे देवि! उसका सम्पूर्ण कुल देवी के अनुग्रह से पवित्र हो जाता है। हे कुलेशानि! कुलज्ञाता को अन्य धर्मों की आवश्यकता नहीं रह जाती।
हे कुलेशि! कुलनिष्ठ कौलिक महात्माओं को अन्तकाल में मैं परम ज्ञान प्रदान करती हूँ, इसमें सन्देह नहीं।
दीर्घ परिश्रम और थोड़ा फल देने वाले समय (मत) को लोग चाहते है। सुख से सभी फलों को देने वाले कुलधर्म को कौन छोड़ता है।
वेद शास्त्र से रहित होकर भी कुलज्ञ सर्वज्ञ होता है और वेद शास्त्र तथा आगम का ज्ञाता भी यदि कुल को नहीं जानता, तो वह अज्ञ (मूर्ख) ही है।
हे देवि! आपके भक्त ही कुल की महिमा को जानते हैं, अन्य नहीं जानते। जिस प्रकार चकोर ही चन्द्रमा की छवि को जानते हैं, दूसरे जीव उसे नहीं जानते।
हे प्रिये! कुलश ही कुल की कथा को सुनकर प्रसन्न होते हैं जैसे ज्योत्सना से समुद्र ही वृद्धि को प्राप्त करता है, छोटी नदियाँ नहीं।
सार तत्त्व को जानने वाले कौलिक लोग दूसरे धर्मों की ओर ध्यान नहीं देते, जैसे भौरे अन्य पुष्पों की अपेक्षा मन्दार पुष्प की ही सुगन्ध से आकृष्ट होते हैं।
भगवान् शिव जिस चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करते हैं, उसको राहु निगल जाता है। इसी प्रकार सारतत्त्व को जानने वाले ही कुलधर्म को सम्मान देते हैं, अन्य नहीं।
ज्ञानी लोग ही कुल दर्शन को जानते हैं, अज्ञानी जन नहीं जानते। जैसे जल में मिले हुए दूध को क्या हंस के समान बगुला पक्षी भी जानता है? नही।
यह संसार शिवशक्तिमय है और इस संसार में कौल साधक की प्रतिष्ठा है। अतः सबसे श्रेष्ठ कौल है। फिर यह सर्व साधारण कैसे हो सकता है?
छहों दर्शन मेरे अङ्ग हैं - दो पैर, दो हाथ, कुक्षि एवं शिर। इनमें जो भेद करता है, वह मानों मेरे अङ्ग का भेदन करता है।
उसी प्रकार ये छः दर्शन (जो वेदों से निकले हैं) कुल के छः अंग है। अतः हे प्रिये! कौलशास्त्र को वेदात्मक शास्त्र समझना चाहिए।
सभी दर्शनों में एक देवता ही फलदायक है। हे प्रिये! इस कुल में मनुष्य को भुक्ति एवं मुक्ति देने वाला दैवत है।
हे सिद्धयोगीश्वरि! हे प्रिये! लोक धर्म के विरुद्ध होते हुए भी प्रत्यक्ष फल देने के कारण कुलधर्म की प्रामाणिकता है। हे प्रिये! सभी जीव प्रत्यक्ष फल चाहते है। उसकी उपलब्धि के बल से सभी कुतर्की मारे गए, क्योंकि परोक्ष को कौन जानता है कि किसका क्या होगा? अतः जो प्रत्यक्ष फल देता है, वही उत्तम दर्शन है।
हे महेशानि! इस कुलधर्म को जानकर सभी मनुष्य मुक्त हो जाते हैं। यह देखकर मैंने कौल धर्म की निन्दा की है। (संसार की रक्षा हेतु कुलधर्म की निन्दा)
वस्तुतः आपकी कृपा से रहित, कुलज्ञान के विरोधी एवं अज्ञानी पशुओं के लिए कुलधर्म की निन्दा की गई है।
जिस मनुष्य के पिछले जन्मों के पाप-कर्मों के बन्धन अधिक हैं, उस पर गुरु की कृपा नहीं होती और न उसे कुल का ज्ञान मिलता है।
सबको प्रकाशित करने वाले सूर्य को जैसे अन्धे नहीं देख पाते, उसी प्रकार आपकी माया से मोहित मनुष्य कुल को नहीं जान पाते।
शैव, वैष्णव एवं सौर आदि दर्शनों को मनुष्य भक्ति के साथ नित्यप्रति भजते हैं किन्तु उनका परिश्रम व्यर्थ जाता है और उन्हें वाञ्छित फल नहीं मिलता।
वेद, शास्त्र एवं आगमों में भोग और मोक्ष का एक ही साधन आपका दर्शन बताया गया है क्योंकी वह मेरा प्रिय है। किन्तु मूढ़ लोग उसकी निन्दा करते हैं।
(दुरात्माओं को भ्रमित करने के लिए ही पशुशास्त्रों का प्रचार) हे देवि! पशुओं को मैंने करोड़ों शास्त्रों से भ्रमित कर रखा है। वे कुलधर्म को नहीं जानते और व्यर्थ के ज्ञान का अभिमान करते हैं। सभी पशु शास्त्रों को मैंने ही दूसरे स्वरूप को ग्रहण कर दुरात्माओं को मुग्ध करने के लिये कहा है। महापाप के वशीभूत होकर उनमें वाञ्छा उत्पन्न होती है। कोटि शतकल्पों में भी उन्हें सद्गति नहीं मिलती। पापात्मा लोग प्रेरित किये जाने पर भी कुल में नहीं आते और पुण्यात्मा लोग मना किये जाने पर भी कुल का ही अवलम्बन करते हैं।
कुलधर्म से देवगणों ने देवत्व को प्राप्त किया है। मुनि एवं योगीश्वरादि ने इसी से सिद्धि पाई है।
पशुव्रतों आदि में लगे हुये दम्भी लोग पृथ्वी पर सरलता से मिल जाते हैं किन्तु जो कौल धर्म (शक्ति उपासक) की ही सेवा करते हैं, वे महापुरुष बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।
मिथ्या तत्त्वार्थ को जानने वाले मनुष्य बहुत हैं किन्तु हे महेशानि! इस कुलतत्त्व के ज्ञाता दुर्लभ हैं।
हे कुलनायिके! जिस प्रकार रोग से व्याकुल कुछ मनुष्य महाव्याधि को नष्ट करने वाली दिव्य औषधि का सेवन नहीं करते, अपितु उस व्याधि को बढ़ाने वाले अपथ्य का ही सेवन करते हैं और दूषित औषधि का प्रयोग करते है, उसी प्रकार अज्ञ लोग जन्म से मृत्यु तक आपकी दया से रहित होकर सदा सांसारिक कर्मों में लगे रहते हैं और संसार के बन्धन से छुड़ाने वाले कुल धर्म का पालन नहीं करते।
जिस प्रकार लोग व्यापारियों से जंगलों में उत्पन्न होने वाली मिर्च आदि की याचना मोहवश करते हैं और अमूल्य रत्नों को उनसे नहीं माँगते, उसी प्रकार हे कुलनायिके! आपकी माया के वशीभूत होकर मूर्ख लोग पशुशास्त्रों और कर्म बन्धन में डालने वाले फलों के सम्बन्ध में पूछते रहते हैं और भुक्ति-मुक्ति रूपी फल को देने वाले कुलधर्म के सम्बन्ध में नहीं पूँछते।
जिस प्रकार हाथ में रखी हुई कस्तूरी, कर्पूर और मणि को वह मूर्ख वास्तविक रूप में भ्रमवशात् नहीं पहचान पाता, क्योंकि उसके मन में क्रमशः कीचड़, नमक और कांच पाने की इच्छा रहती है, उसी प्रकार आपकी कृपा से रहित व्यक्ति 'कौल' साधक को पाकर भी उसे नहीं जान पाता। हे देवेशि! आपकी माया से उत्पन्न मोह की महिमा अपार है, जो देवताओं को भी मुग्ध कर देती है तो फिर अज्ञानियों की क्या बात है।
प्रियतमा (शक्ति) का मुखदर्शन कर मद्य पान और मांस भोजनपूर्वक जप करने से परम पद प्राप्त होता है। गुरु की दया से ही यह कुलदर्शन मिलता है। आपके भक्त ही इस भुक्ति एवं मुक्ति दायक कुलदर्शन को जानते हैं, अन्य नहीं।
गुरूपदेश से रहित व्यक्ति अन्धकार में ही रहते हैं। ऐसे लोग स्वयं पहले से मुग्ध रहकर सभी लोगों को भ्रम में डालते हैं।
पापी लोग दुराचारी होकर कहा करते हैं कि स्वामी और कितने ही सेवक का सम्बन्ध कैसे सम्भव है।
ज्ञान का मिथ्या अभिमान करने वाले बहुत से जन अपनी बुद्धि से 'कौलिक धर्म' की परम्पराहीन कल्पना करते हैं।
केवल (लौकिक) मद्यपान से यदि व्यक्ति को सिद्धि मिल जाती, तो सभी पापी भी मद्यप सिद्धि को प्राप्त कर जाते।
मांस खाने से ही यदि सद्‌गति मिल जाती, तो संसार के सभी मांसाहारी पुण्यात्मा हो जाते हैं।
केवल शक्ति के सम्भोग से ही यदि मोक्ष हो जाता, तो सभी स्त्रीसङ्ग करने वाले जीव जन्तु मुक्त हो जाते।
हे महादेवि! कुलमार्ग की मैंने कभी निन्दा नहीं की है। जो आचाररहित हैं, वे ही निन्दनीय है, अन्य नहीं।
कौलिक धर्म की आचार पद्धति मैंने बताया है। हे देवि! उसे छोड़कर भिन्न प्रकार से जो व्यवहार करते हैं, वे पण्डित अहम्मन्य मूर्ख हैं।
कुलमार्ग पर चलना खड्ग की धार पर चलने, बाघ की गरदन पकड़ने और सर्प को पहनने से भी अधिक कठिन है।
हे देवेशि! वृथापान को सुरापान कहते हैं। वेदादि मैं उसे महापाप बताया गया है। पशु भाव के साधकों के लिये (लौकिक) मद्यमांस का सूंघना, देखना, छूना मना है किन्तु कौलिकों के लिये वे (अलौकिक) परम फलदायक हैं।
द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के लिये ग्यारह प्रकार के मद्य अमेध्य होने के कारण अग्राह्य है। बारहवीं (दिव्य) महामद्य सभी में उत्तम है और द्विजातियों द्वारा ग्राह्य है। अन्नों का मल होने से 'सुरा' पाप को उत्पन्न करती है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को (लौकिक) सुरापान नहीं करना चाहिये।
(लौकिक) सुरा (शराब) के देखने मात्र से दोष होता है, उसे दूर करने के लिये सूर्य का दर्शन करे। उसे सूँघने से जो दोष होता है, उसे दूर करने के लिये तीन बार प्राणायाम करे और घुटने तक जल में प्रवेश कर दिन भर उपवास करे। मद्य को छू लेने पर प्रायश्चित्त की विधि यह है कि तीन रात तक नाभि के ऊपर जल में प्रवेश कर दिन में उपवास करे। जानबूझकर सुरापान करने पर जिह्वा को दग्ध करने से मुख की शुद्धि होती है। इस प्रकार मद्य के स्पर्शादि दोष की निवृत्ति के लिए ये प्रायश्चित्त कहे गए हैं।
हे प्रिये! अपने स्वार्थ के लिये जो प्राणियों की विधि रहित हिंसा करता है, वह उस पशु के शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने दिनों तक घोर नरक में निवास करता है और मरने पर वह दुराचारी तिर्यग् योनि में जन्म पाता है।
१. पशु का वध के लिए अनुमान करने वाला, २. पशु को विश्वास में लाने वाला, ३. पशु का वध करने वाला, ४. पशु को खरीदने वाला, ५. पशु को बेचने वाला, ६. पशु का संस्कार करने वाला, ७. पशु को लाने वाला, और ८. पशु मांस को खाने वाला ये आठ प्रकार के 'घातक' कहे गये हैं।
धन के लिए पशु बेचना, मांस खाकर उपभोग करना और बँधे हुए पशु का वध करना - ये तीन प्रकार के 'वध' है।
मांस को देखने से सुरादर्शन के समान ही प्रायश्चित्त करना चाहिए। क्योंकि मांस एवं मद्य का सेवन कभी भी अविधिपूर्वक न करे।
विधिपूर्वक सेवन करने से हे देवि! आप शीघ्र प्रसन्न होती है। यथा विधि सेवन न करने से हे वीरवन्दिते! वह आत्मज्ञान को नष्ट करता है।
बिना विधि-विधान के तिनके को भी नहीं तोड़ना चाहिए। विधिपूर्वक बैल या द्विज का भी वध करने से पाप नहीं होता।
हे प्रिये! अधिक कहने से क्या लाभ? एक तत्त्व की बात सुनिए - हे महादेवि! जीवन्मुक्ति का सरल उपाय कुलशास्त्रों में छिपा हुआ है, जो सोने में सुगन्ध के समान मोक्ष के अभिलाषियों के लिए उत्तम फलरूप है। कुल के ज्ञाताओं में भी जो ऊर्ध्वाम्नाय से प्रसिद्ध हैं, उनका ज्ञान श्रेष्ठ है।
हे पार्वति! सभी कुल-शास्त्रों को मैंने ही कहा है। अतः वे स्वतः प्रमाण हैं। इसमें सन्देह नहीं है अतः तर्क-वितर्क द्वारा साधक को उनका खण्डन नहीं करना चाहिए।
देवताओं और पितरों के लिए समर्पित किया जाने वाला मद्य अमृत-स्वरूप हो जाता है। यह उसी प्रकार अत्यन्त स्वादिष्ट और सन्तुष्टी प्रदान करने वाला होता है जैसे घृत, मधु और चीनी मिले दूध की खोर अत्यन्त स्वादिष्ट होती है।
पुं-पशु की बलि देकर उसके मांस को विधिवत् स्वर्णपात्र में रखकर वैदिक रीति से प्रसादरूप में उसे ग्रहण करने से अविलम्ब ही सर्वपापों का नाश होकर तत्त्वज्ञान की उपलब्धि होती है।
हे अम्बिके! कुल का यह कुछ माहात्म्य मैंने संक्षेप में यहाँ कहा है। हे कुलेशानि! आप पुनः अब क्या सुनना चाहती है?
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