द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के लिये ग्यारह प्रकार के मद्य अमेध्य होने के कारण अग्राह्य है। बारहवीं (दिव्य) महामद्य सभी में उत्तम है और द्विजातियों द्वारा ग्राह्य है। अन्नों का मल होने से 'सुरा' पाप को उत्पन्न करती है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को (लौकिक) सुरापान नहीं करना चाहिये।
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