सर्वकर्मविहीनोऽपि वर्णाश्रमविवर्जितः ।
कुलनिष्ठः कुलेशानि भुक्तिमुक्त्योः स भाजनम् ॥
हे कुलेशानि! सब प्रकार के (नित्य, नैमित्तिक) कर्मों से रहित और वर्ण तथा आश्रम से हीन व्यक्ति भी कुलधर्म में निष्ठा रखकर भुक्ति और मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।
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