पूर्वजन्मों मे किये गये अभ्यास के फलस्वरूप जीव को कुलधर्म के ज्ञान का प्रकाश स्वतः प्राप्त होता है। यह ज्ञान उपदेश के बिना ही, जैसे स्वप्न में प्राप्त अनुभूतियों से जागकर ज्ञान मिलता है वैसे ही स्वयं प्रतिभासित हो जाता है।
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