सर्वधर्माश्च देवेशि पुनरावर्त्तकाः स्मृताः ।
कुलधर्मस्थिता ये च ते सर्वेऽप्यनिवर्त्तकाः ॥
अन्य सभी धर्म तो 'पुनरावर्तक' हैं अर्थात् उनके पालन करने वाले आवागमन के चक्र में पड़े रहते हैं। किन्तु हे देवेशि! सभी कुलधर्मानुयायी 'अनिवर्तक' अर्थात् आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।