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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 52
निन्दन्तु बान्धवाः सर्वे त्यजन्तु स्त्रीसुतादायः । जना हसन्तु मां दृष्ट्वा राजानो दण्डयन्तु वा ॥ सेवे सेवे पुनःसेवे त्वामेव परदेवते । त्वद्धर्म नैव मुञ्चामि मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ एवमापद्गतस्यापि यस्य भक्तिः सुनिश्चला। स तु सम्पूज्यते देवैरमुत्र स शिवो भवेत् ॥
सभी भाई बन्धु चाहे निन्दा करें, स्त्री पुत्रादि चाहे छोड़ दें, लोग मुझे देखकर चाहे हँसी उड़ाएँ या राजा चाहे दण्ड दें, किन्तु हे परदेवते! मैं आपकी बार-बार सेवा ही करता रहूँगा। मन, वचन, शरीर एवं कर्म से मैं आपके धर्म को नहीं छोडूगाँ इस प्रकार आपत्ति में पड़कर भी जिसकी भक्ति दृढ़ बनी रहती है, वह देवताओं के द्वारा पूजित होकर शिवत्व को प्राप्त करता है।
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