यथा रोगातुराः केचिन्मानवाः कुलनायिके । दिव्यौषधं न सेवन्ते महाव्याधिविनाशनम् ॥
तद्व्याधिवर्द्धनापथ्यं कुर्वन्ति हि कुभेषजम् । तथैव जन्ममरणकृतं सांसारिकीं क्रियाम् ॥
समाचरन्ति सततं त्वत्कारुण्यविवर्जिताः । न भजन्ते कुलं धर्म भववन्धविमोचनम् ॥
हे कुलनायिके! जिस प्रकार रोग से व्याकुल कुछ मनुष्य महाव्याधि को नष्ट करने वाली दिव्य औषधि का सेवन नहीं करते, अपितु उस व्याधि को बढ़ाने वाले अपथ्य का ही सेवन करते हैं और दूषित औषधि का प्रयोग करते है, उसी प्रकार अज्ञ लोग जन्म से मृत्यु तक आपकी दया से रहित होकर सदा सांसारिक कर्मों में लगे रहते हैं और संसार के बन्धन से छुड़ाने वाले कुल धर्म का पालन नहीं करते।
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