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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 110
अविधानेन यो हन्यादात्मार्थं प्राणिनः प्रिये ॥ निवसेन्नरके घोरे दिनानि पशुरोमभिः । स मृतोऽपि दुराचारस्तिर्यग्योनिषु जायते ॥
हे प्रिये! अपने स्वार्थ के लिये जो प्राणियों की विधि रहित हिंसा करता है, वह उस पशु के शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने दिनों तक घोर नरक में निवास करता है और मरने पर वह दुराचारी तिर्यग् योनि में जन्म पाता है।
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