कस्तूरी कर्दमधिया कर्पूरं लवणेच्छया । शार्करं शकराभ्रान्त्या मणिं काचमनीषया ॥
यथादृष्टं न मन्यन्ते करस्थमपि पामराः । तथा कौलं न जानन्ति त्वत्प्रसादविवर्जिताः ॥
अहो मोहस्य माहात्म्यं त्वन्मायाजनितस्य च । किमज्ञानपि देवेशि मोहयेदमरानपि ॥
जिस प्रकार हाथ में रखी हुई कस्तूरी, कर्पूर और मणि को वह मूर्ख वास्तविक रूप में भ्रमवशात् नहीं पहचान पाता, क्योंकि उसके मन में क्रमशः कीचड़, नमक और कांच पाने की इच्छा रहती है, उसी प्रकार आपकी कृपा से रहित व्यक्ति 'कौल' साधक को पाकर भी उसे नहीं जान पाता। हे देवेशि! आपकी माया से उत्पन्न मोह की महिमा अपार है, जो देवताओं को भी मुग्ध कर देती है तो फिर अज्ञानियों की क्या बात है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।