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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 42
विहाय कुलधर्म यः परधर्मपरो भवेत् । करस्थं रत्नमुत्सृज्य दूरस्थं काचमीहते ॥
कुल धर्म का परित्याग कर जो अन्य धर्म में परायण हो जाता है वह मानों हाथ में रखे रत्न को छोड़कर दूर स्थित काँच की इच्छा करता है।
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