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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 58
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः । स जीवति मनो यस्य कुलधर्मे व्यवस्थितम् ॥
वृक्षों और मृग-पक्षियों का भी जीवन है किन्तु वास्तविक जीवन उसी का है, जिसका मन कुल धर्म में लगा हुआ है।
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