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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 109
सुरादर्शनमात्रेण कुर्यात् सूर्यावलोकनम् । तत्समाघ्राणमात्रेण प्राणायामत्रयं चरेत् ॥ आजानुभ्यां भवेन्मग्नो जले चोपवसेदहः । ऊर्ध्व नाभेस्त्रिरात्रन्तु मद्यस्य स्पर्शने विधिः ॥ सुरापाने कामकृते ज्वलन्तीं तां विनिक्षिपेत् । मुखे तया विनिर्दग्धे ततः शुद्धिमवाप्नुयात् ॥ मद्यस्पर्शादिदोषस्य प्रायश्चित्तविधिः स्मृतः ।
(लौकिक) सुरा (शराब) के देखने मात्र से दोष होता है, उसे दूर करने के लिये सूर्य का दर्शन करे। उसे सूँघने से जो दोष होता है, उसे दूर करने के लिये तीन बार प्राणायाम करे और घुटने तक जल में प्रवेश कर दिन भर उपवास करे। मद्य को छू लेने पर प्रायश्चित्त की विधि यह है कि तीन रात तक नाभि के ऊपर जल में प्रवेश कर दिन में उपवास करे। जानबूझकर सुरापान करने पर जिह्वा को दग्ध करने से मुख की शुद्धि होती है। इस प्रकार मद्य के स्पर्शादि दोष की निवृत्ति के लिए ये प्रायश्चित्त कहे गए हैं।
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