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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 97
पेयं मह्यं पलं खाद्यं समालोक्य प्रियामुखम् । इत्येवाचरणं जाप्यं परिप्राप्यं परम्प्पदम् ॥ गुरुकारुण्यसंलभ्यमीदृशं कुलदर्शनम् । त्वद्भक्ता एव जानन्ति नेतरे भुक्तिमुक्तिदम् ॥
प्रियतमा (शक्ति) का मुखदर्शन कर मद्य पान और मांस भोजनपूर्वक जप करने से परम पद प्राप्त होता है। गुरु की दया से ही यह कुलदर्शन मिलता है। आपके भक्त ही इस भुक्ति एवं मुक्ति दायक कुलदर्शन को जानते हैं, अन्य नहीं।
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