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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 44
कुलान्वयं समुत्सृज्य योऽन्यमन्वयमीक्षते । तडागादिव तृष्णार्त्ता मृगतृष्णां प्रधावति ॥
कुल परम्परा को छोड़कर, जो दूसरे परम्परा की इच्छा करता है, वह प्यासा मानों तालाब को छोड़कर मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता है।
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