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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 61
विद्वानपि च मूखोंऽसौ धार्मिको वाप्यधार्मिकः । व्रतस्थोऽप्यव्रतस्थो वा यः कौलविमुखो जनः ॥ जातास्त एव जगति जन्तवः साधु जीविनः । कुलधर्मपरा देवि शेषाश्च द्वारगर्दभाः ॥
विद्वान् हो या मूर्ख, धार्मिक हो या अधार्मिक, व्रतधारी हो या व्रत से विमुख हो, जो मनुष्य कौल से विमुख है, वह संसार में जन्म भर लेता है, हे देवि! उसका कोई महत्त्व नहीं होता, जैसे द्वार पर बँधे गधे का कोई महत्त्व नहीं। केवल कुल धर्मपरायण व्यक्ति ही पवित्र जीवन जीते हैं।
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