संत्यज्य कुलमन्त्राणि पशुमन्त्राणि यो जपेत् ।
स धान्यराशिमुत्सृज्य पांसुराशिं जिघृक्षति ॥
कुल मन्त्रों को छोड़कर जो 'अन्य पशु मन्त्रों' का जप करता है, वह मानों अन्न के ढेर को छोड़कर भूसे के ढेर की इच्छा करता है।
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