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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 81
एतान्येव कुलस्यापि षडङ्गानि भवन्ति हि । तस्माद्वेदात्मकं शास्त्रं विद्धि कौलात्मकं प्रिये ॥
उसी प्रकार ये छः दर्शन (जो वेदों से निकले हैं) कुल के छः अंग है। अतः हे प्रिये! कौलशास्त्र को वेदात्मक शास्त्र समझना चाहिए।
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