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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 95
यथा चारण्यजातांस्तु मरीचादीन् वणिग्जनान् । मोहतो मानवाः प्रीत्या याचन्ते कुलनायिके ॥ अनर्याणि च रत्नानि न याचन्ते हि केचन । तथैव पशुशास्त्राणि कर्मपाशफलानि च ॥ इति पृच्छन्ति मूर्खास्ते तव मायाविमोहिता । कुलधर्म न पृच्छन्ति भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥
जिस प्रकार लोग व्यापारियों से जंगलों में उत्पन्न होने वाली मिर्च आदि की याचना मोहवश करते हैं और अमूल्य रत्नों को उनसे नहीं माँगते, उसी प्रकार हे कुलनायिके! आपकी माया के वशीभूत होकर मूर्ख लोग पशुशास्त्रों और कर्म बन्धन में डालने वाले फलों के सम्बन्ध में पूछते रहते हैं और भुक्ति-मुक्ति रूपी फल को देने वाले कुलधर्म के सम्बन्ध में नहीं पूँछते।
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