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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 115
तृणं वाप्यविधानेन छेदयेन्न कदाचन । विधिना गां द्विजं वापि हत्या पापैर्न लिप्यते ॥
बिना विधि-विधान के तिनके को भी नहीं तोड़ना चाहिए। विधिपूर्वक बैल या द्विज का भी वध करने से पाप नहीं होता।
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