नापि लोभान्न च क्रोधान्न द्वेषान्न च मत्सरात् ।
न कामन्न भयाद्वापि कुलधर्मं परित्यजेत् ॥
न लोभ से, न क्रोध से, न द्वेष से, न मत्सर (ईर्ष्या) से, न काम से और न भय से किसी भी परिस्थिति में कुलधर्म का त्याग न करे।
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