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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 119
हिरण्यपावाः खादिश्च अबध्नन् पुरुषं पशुम् । दीक्षामुपेयादित्याद्याः प्रमाणं श्रुतयः प्रिये ॥
पुं-पशु की बलि देकर उसके मांस को विधिवत् स्वर्णपात्र में रखकर वैदिक रीति से प्रसादरूप में उसे ग्रहण करने से अविलम्ब ही सर्वपापों का नाश होकर तत्त्वज्ञान की उपलब्धि होती है।
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