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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 118
देवताभ्यः पितृभ्यश्च मधु वाता ऋतायते । स्वादिष्ठया मदिष्ठया क्षीरं सर्पिर्मधूदकम् ॥
देवताओं और पितरों के लिए समर्पित किया जाने वाला मद्य अमृत-स्वरूप हो जाता है। यह उसी प्रकार अत्यन्त स्वादिष्ट और सन्तुष्टी प्रदान करने वाला होता है जैसे घृत, मधु और चीनी मिले दूध की खोर अत्यन्त स्वादिष्ट होती है।
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