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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 11
प्रविशन्ति यथा नद्यः समुद्रम् ऋजुवक्रगाः । तथैव विविधा धर्माः प्रविष्टाः कुलमेव हि ॥
टेढ़ी-मेढ़ी, एवं सीधी होकर भी जाने वाली सभी नदियाँ जैसे समुद्र में ही मिल जाती हैं, वैसे ही विविध प्रकार के धर्म भी अन्ततः कुलधर्म में ही विलीन हो जाते हैं।
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