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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 107
वृथा पानन्तु देवेशि सुरापानं तदुच्यते । तत्महापातकं ज्ञेयं वेदादिषु निरूपितम् ॥ अनाप्रेयमनालोक्यमस्पृश्यञ्चाप्यपेयकम् । मद्यं मांसं पशूनान्तु कौलिकानां महाफलम् ॥
हे देवेशि! वृथापान को सुरापान कहते हैं। वेदादि मैं उसे महापाप बताया गया है। पशु भाव के साधकों के लिये (लौकिक) मद्यमांस का सूंघना, देखना, छूना मना है किन्तु कौलिकों के लिये वे (अलौकिक) परम फलदायक हैं।
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