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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 100
बहवः कौलिकं धर्म मिथ्याज्ञानविडम्बकाः । स्वबुध्दया कल्पयन्तीत्थं पारम्पर्यविवर्जिताः ॥
ज्ञान का मिथ्या अभिमान करने वाले बहुत से जन अपनी बुद्धि से 'कौलिक धर्म' की परम्पराहीन कल्पना करते हैं।
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