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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 8
गुह्याद् गुह्यतरं देवि सारात् सारं परात् परम् । साक्षात् शिवप्रदं देवि कर्णाकर्णिगतं कुलम् ॥
हे देवि! कुलाचार समस्त गुह्य में भी अत्यन्त गुह्य आचार है। सभी सारों का भी सार है। उत्तमों में भी उत्तम आचार है। गुरु शिष्य की परम्परा से एक दूसरे से सुनकर गुरुमुख से प्राप्त होता है। हे देवि! यह साक्षात् शिवप्रद (कल्याणकारी) है।
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