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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 10
एकतः सकला धर्मा यज्ञतीर्थव्रतादयः । एकतः कुलधर्मश्च तत्र कौलोऽधिकः प्रिये ॥
हे प्रिये! एक तरफ सभी धर्म, यज्ञ, तीर्थ एवं व्रत आदि पुण्य आचार हों और एक तरफ मात्र कुल धर्म ही हो तो उनमें से कौलिक आचार मुझे अधिक प्रिय है।
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