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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 105
अन्यथा कौलिके धर्मे आचारः कथितो मया। विचरन्त्यन्था देवि मूढाः पण्डितमानिनः ॥
कौलिक धर्म की आचार पद्धति मैंने बताया है। हे देवि! उसे छोड़कर भिन्न प्रकार से जो व्यवहार करते हैं, वे पण्डित अहम्मन्य मूर्ख हैं।
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